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श्रीमद् भगवद्गीता का मनोविज्ञान

Posted On: 18 May, 2017 में

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एक प्रश्न मन में उठता है कि आखिर गीता है क्या? हमारे लिए क्या परिचय है गीता का? हममें से कुछ लोगों के लिए ये महज़ एक धर्मग्रंथ है, आध्यात्म से संबंधित कुछ है, कुछ के लिए तो गीता का परिचय सिर्फ अदालतों में कसम लेने वाले ग्रन्थ तक ही सीमित है। लेकिन वस्तुतः गीता का परिचय और प्रासंगिकता विस्तृत और व्यापक है, गीता सिर्फ श्री कृष्ण-अर्जुन के संवादों का संकलन नहीं है; बल्कि यह मानव जीवन को आदर्श रूप में विकसित करने का वह दर्शन है जो अद्वितीय है।
जीवन में एक समस्या हम सभी के साथ रहती है, कि हम निश्चय नहीं कर पाते , हमें क्या करना चाहिए; क्या नहीं? हमारा अगला कदम क्या हो जिससे सब संतुलित रहे? इस उलझन की कई वजहें होती हैं : या तो हम जोखिम लेने से बचते हैं, या हम बेहतर के चयन में भ्रमित होते हैं, या सामाजिक व्यवस्था के अनुकूल बने रहने की कोशिश में हम सही-गलत के फेर में ही रह जाते हैं। अर्जुन के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था, हम सभी महाभारत की कहानी से परिचित हैं, कि कैसे अनेक घटनाओं,तर्क-वितर्क व शांति संदेशों के बाद जब युद्ध के निश्चय से , कौरव और पांडव दोनों ही सेनाएं अस्त्र-शस्त्र से सज्जित हो कुरुक्षेत्र में आ खड़ी होती हैं, और यह तय हो चुका होता है कि युद्ध होगा ही! तब कुछ ऐसा होता है जो संसार को ना सिर्फ बदल कर रख देता है, बल्कि भविष्य की करोड़ों पीढ़ियों को जीवन दर्शन का वह आदर्श ज्ञान पुंज प्रदान करता है, जिसमें मनुष्य के सभी प्रश्नों के उत्तर हैं। युद्ध के लिए मैदान में आया धनुर्धारी अर्जुन अपने सम्मुख खड़ी शत्रु सेना की ओर देखता है, और अचानक उसका ध्यान अपने पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य, कृपाचार्य आदि सगे सम्बन्धियों पर जाता है। वह बहुत अधिक भावुक और शंकित हो जाता है। वह अपने रथ-सारथी द्वारिकाधीश श्री कृष्ण से कहता है ” हे केशव ! इस युद्ध में तो मुझे अपने पितामह,बंधु-बांधव आदि का वध करना होगा, ये सोचने से ही मेरा अंग-अंग शिथिल हुआ जा रहा है, कंठ सूख रहा है, धनुष-वाण पकड़ने वाले ये हाथ सुन्न हो रहे हैं, ऐसी कंपकपी तो मैंने शिशिर ऋतु में भी अनुभव नहीं की थी, मेरा गांडीव मेरे हाथों से गिरा जा रहा है” । अर्जुन की स्थिति इस समय ठीक वैसी है ,जैसे हम किसी भी बड़े काम को करने से पहले घबरा जाते हैं, हमें समझ नहीं आता कि क्या करना है और कैसे करना है, बस इसी कारण हम सोचते हैं कि पलायन ही सही विकल्प है!
श्रीमद् भगवद्गीता का प्रथम अध्याय हमारी इसी “Under Performance” के विषय में है, और सम्पूर्णतः श्रीमद भगवद्गीता हमें मष्तिष्क की क्रियाविधि को समझने का एक सशक्त आधार/नींव प्रदान करता है।
किसी काम को घबरा कर छोड़ देना, अनुकूल ना जानकर विमुख हो जाना आदि मनुष्य की आम प्रवृति है। हम कभी अपने ‘comfort zone’ से बाहर आना ही नहीं चाहते। वही अर्जुन भी चाहता है, वह कहता है ” प्रभु ! इस युद्ध को करने से तो अच्छा है कि मैं भिक्षा मांग कर जीवन यापन कर लूँ” । मगर श्रीकृष्ण मनुष्य की इस मनोदशा से परिचित हैं, वे अर्जुन के मन में घर कर चुके मोह को पहचानते हुए उसे समझाते हैं कि ” हे अर्जुन! तुम जिन के लिए व्याकुल हो रहे हो, वे हमेशा तो तुम्हारे रहेंगे नहीं, तो यह जानकर भी अगर तुम उनके लिए शोक कर रहे हो तो यह अज्ञानता है” । श्री कृष्ण ने जो कहा वह हम सभी अभी तक कई बार सुन चुके हैं; मगर कभी इसे गम्भीरता से समझते नहीं। दरअसल गीता दर्शन हमें “Practical way of life” दिखाता है। कृष्ण समझा रहे हैं कि जिस मोह में तुम बंधे हुए हो, वो तुम्हें तुम्हारे सही रास्ते से खींच कर किसी में उलझा देगा और तुम्हारा वास्तविक कर्म छूट जाएगा। और इस कर्म के छूट जाने का उत्तरदायित्व तुम किसी और(भगवान्) पर नहीं डाल सकते। तुमने धनुष चलाने और युद्ध करने की शिक्षा ली है, तुम कर्म और वचन से क्षत्रिय बने हो, तो समाज की रक्षा हेतु , अनीति और अन्याय के विरुद्ध तुम्हें युद्ध ही करना है, चाहे किसी से भी करना पड़े। यदि तुम ऐसा नहीं करोगे तो न सिर्फ समाज और भविष्य की नज़रों में कायर कहलाओगे बल्कि अपनी योग्यता व आत्मविश्वास के साथ भी अन्याय करोगे। अगर भिक्षा ही मांगनी थी तो क्षत्रिय होने की आवश्यकता ही क्या थी? मोह(attachment) तुम्हारे लिए नहीं है ।
यही मोह एक आम मनुष्य अपने जीवन में अनुभव करता है, वह किसी ऐसी चीज़ से बंध जाता है कि अपने वास्तविक पथ से भटक जाता है। ये मोह अक्सर प्रेमी-प्रेमिका का हो सकता है, किसी ख़ास जगह का हो सकता है, किसी ख़ास जगह मिलने वाली निरंतर तारीफों का हो सकता है, किसी अनुकूलता का हो सकता है, किसी चीज़ का अर्थात किसी का भी हो सकता है जो हमें अपने हित में सही फैसले लेने में रोकता हो! शायर इकबाल की एक मशहूर ग़ज़ल है “सितारों से आगे जहां और भी हैं” इसमें एक शेर इस तरह है कि
“तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा
तेरे सामने आसमाँ और भी हैं”
अर्थात तुम अगर बाज़ हो तो उड़ान ही तुम्हारा काम है, तो आसमानों से क्या घबराना? मगर फिर भी धरती से मोह होता है। और ये मोह होता कैसे है? इसके विषय में श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि
“मनुष्य विषयों का ध्यान करता है, जो मोह या आसक्ति को जन्म देता है, मोह फिर काम को जन्म देता है, जब काम की पूर्ति नहीं होती तो यह अतृप्त काम क्रोध को जन्म देता है, क्रोध बढ़ने से विषयों के प्रति लालसा और बढ़ जाती है, और सोचने की शक्ति भटक जाती है, फिर स्मृति का नाश होता है और स्मृति के नाश से बुद्धि का विनाश होता है, और बुद्धि का विनाश मनुष्य का सर्वनाश कर देता है! “
अब आप पूछेंगे कि इस तरह तो सभी समस्याओं की जननी इच्छा ही है। तो क्या मनुष्य को इच्छाओं का त्याग कर देना चाहिए ? नहीं ! हमें विवेकशील इच्छाओं का पोषण करना चाहिए। इच्छाओं पर नियंत्रण आवश्यक है, इच्छाओं का होना स्वाभाविक है, इच्छाएं तो होंगी ही! मगर इच्छाओं को खुद पर हावी होने से रोकना ही श्रेष्ठ कर्म है। सफल व्यक्ति अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण करते हैं , उनका दमन नहीं करते। वे आँख बंद करके नहीं जीते, वे कान बंद करके नहीं सोते। यदि उनके आस-पास कोई गंध है, ध्वनि है या नाद है,चाहे वह उनकी पसंद का हो या ना हो फिर भी वे उसे अनुभव करने के लिए विवश हैं, मगर ये उनके नियंत्रण पर है कि वे क्या ग्रहण करते हैं और क्या नहीं? विकल्प के इसी मोड़ पर सफल और असफल मनुष्य की पहचान होती है। इसलिए हमें अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण कर अपने कर्म में स्थिर होने, अपने काम में निरंतरता लाने का प्रयास करना चाहिए।
कर्म को करने के लिए भी एक संकल्प आवश्यक है। मोहयुक्त कर्म सफल नहीं हुआ करते, एक surgeon किसी भी आम मरीज की surgery आसानी से कर सकता है; क्यों कि ये उसका कर्म है । मगर जब यही surgery उसे उसकी बेटी या अन्य संबंधी का करनी पड़े, तो उसके हाथ कांपने लगेंगे। क्यों कि उसके कर्म में मोह का मिश्रण होता है। एक और बात : सिर्फ कर्म ही सब कुछ नहीं है, कर्म सद्भाव और अच्छे उद्देश्य के लिए होना चाहिए। क्यों कि रावण -कुम्भकर्ण भी कर्म ही कर रहे थे, जबकि उन्होंने तो ईश्वर की पूजा की ! मगर उद्देश्य क्या था? समाज की हानि! तो कर्म कैसा होना चाहिए ? समाज के हित में , मोह रहित और निरंतर। क्यों कि कर्म के बिना तो जीवन है ही नहीं!

हमारे पास किसी काम को ना करने का दूसरा excuse होता है ,उसके परिणाम के बारे में हमारे खुद के आंकड़े! “ऐसा हो गया तो? ये नहीं हो पाया तो ? वो नहीं मिला तो? ” आदि-आदि ; ये आज के दौर की सबसे बड़ी समस्या है परिणाम की चिंता। ऐसा ही सवाल अर्जुन ने किया कि “हे माधव !इस युद्ध से मुझे मिलेगा क्या, लाभ क्या होगा?” कृष्ण ने सीधा सा जवाब दिया कि “अगर तुम जीते तो यश और समृद्धि भोगोगे, अगर हारे तो वीरगति को प्राप्त होंगे, मगर किसी भी सूरत में कायर नहीं कहलाओगे, क्यों कि वीरगति दुर्गति से बेहतर ही होती है।”मगर कृष्ण का संदर्भ इतना ही नहीं था, वे परिणाम की अनिश्चितता के बारे में अर्जुन को समझाते हैं कि ” हे अर्जुन हार जीत तुम्हारे बस में नहीं हैं, तुम्हारे बस में सिर्फ कर्म करना है, तुम सिर्फ अपना कर्म करो, क्यों कि यदि तुम हार जीत के प्रश्नों में उलझोगे तो कर्म कर ही नहीं पाओगे”। वास्तव में मनुष्य के अधिकार की सीमा इस बात पर खत्म हो जाती है कि वह किसी काम को करेगा या नहीं करेगा। अगर मनुष्य यह सोच ले कि वह किसी चीज़ को पाने या खोने के लिए नहीं ; बल्कि सिर्फ इसलिए कुछ कर रहा है क्यों कि यही उसका कर्तव्य है । तो वह ना तो विजय में घमंड का अनुभव करेगा और ना पराजय में दुखी होगा। यही कर्म का कौशल है यही कर्मयोग है ! और जो कर्मयोगी होते हैं वे कभी असफल नहीं होते। जो मनुष्य किसी चीज़ को पाने पर न ज्यादा उत्साहित होता है और ना पाने पर ना ज्यादा निराश होता है-वही स्थित प्रज्ञ है, उसके जीवन में कभी भी कोई इच्छा उस पर हावी नहीं हो सकती। और उसका प्रदर्शन बाकियों की तुलना में बेहतर होता जाता है। जिसे हम अपनी भाषा में cool रहना कहते हैं! धोनी को ही ले लीजिये, उनकी कूलनेस ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है।

श्रीमद् भगवद्गीता हमें इन्हीं उलझनों से मुक्त होकर अपने कर्म की ओर बढ़ने की बात समझाती है, जीवन का कोई भी पहलू हो, यह आवश्यक है कि हम अपने काम के प्रति ईमानदार बनें, निरंतर बनें ! हमारे यही प्रयास हमारे सही लक्ष्य को हम तक पहुंचा देंगे।

-पुष्यमित्र उपाध्याय

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PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
May 27, 2017

ॐ शांति शांति करक व्याख्या


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