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मायावती वही कर रही हैं जो उन्हें करना चाहिए!

Posted On 16 Mar, 2017 में

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उत्तर प्रदेश में चुनाव खत्म होते हैं, परिणाम आते ही कांग्रेस और सपा की ओर से हार स्वीकार कर ली जाती है और आत्ममंथन की बात कह कर बात खत्म कर दी जाती है। क्या राजनीति सिर्फ इतनी होती है? नहीं! राजनीति जीत और हार पर खत्म नहीं होती; बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जीत और हार से ही राजनीति शुरू होती है। जिसे साबित करते हुए मायावती सामने आती हैं और “भाजपा की जीत” का कारण ईवीएम को बता देती हैं।
ध्यान दीजिये ” मायावती ने परंपरागत रूप से अपनी हार को स्वीकार नहीं करतीं बल्कि दोष तकनीक और सरकार पर डालती हैं”। विश्लेषक इसे अपने हिसाब से देखते होंगे , मगर ये उससे ऊपर की बात है। यहाँ पर मायावती ने वही किया जो पूरे देश में महज चन्द विधानसभा सीटों पर रह जाने वाली पार्टी के नेता द्वारा किया जाना चाहिए। राजनीतिक प्रबंधन के सूरमा कहे जाने वाले प्रशांत किशोर के दिमाग में ये रणनीति शायद आयी ही न हो जो मायावती ने अपने लिए खेल डाली! आज पूरे देश के समाचारों में विजेता मोदी के साथ अगर किसी की चर्चा की जा रही है तो वह नाम है मायावती। ये अखिलेश भी नहीं है जो कि पूरे चुनावी रण में मोदी से सीधे टक्कर लेते रहे, ये नाम उस पार्टी की नेता का है जो महज़ 19 सीटों के साथ गर्त में डूब चुकी है। अखिलेश की तरह मायावती भी “हार स्वीकार” करते हुए आत्म-मंथन पर चली जातीं तो क्या होता ? अगले दिन की सुर्खियां सिर्फ मोदी और भाजपा की प्रचंड जीत पर केंद्रित होकर रह जाती, 19 सीटों वाली मायावती को कोई न पूछता कि कहाँ हैं, कहाँ गयीं? सिर्फ इतना ही नहीं उन्हें वोट देने वाले लोग भी यह समझ जाते कि हमारा नेतृत्व समाप्त हो चुका है और अब पाला बदलने में ही लाभ है। जिसका परिणाम यही होता कि भविष्य में होने वाले चुनावों में मायावती को कोई महत्व नहीं मिल पाता।
मगर मायावती ने अपने अस्तित्व को इस हश्र से बचा लिया है, उन्होंने अखिलेश की तरह हार स्वीकार करने की भूल नहीं की; बल्कि एक तीर से दो शिकार किये हैं । एक ओर जहाँ मायावती ने हार मान चुके नेताओं के बीच मोदी के सामने डटे रहने की दम दिखाई है, वहीं अपने खत्म होते वोट-बैंक को पूरी तरह अलग होने से बचा लिया है। अब तर्क चाहे जो भी दिए जाएँ जनता के मन में यह डाल दिया गया है कि मोदी की यह जीत मशीन की देन है।
ये बात मायावती भी अच्छी तरह से जानती हैं कि ईवीएम में कोई खराबी नहीं है। मगर जब बात अस्तित्व के ही खत्म होने की हो तो यह दांव जरूरी था, और इस दांव से मायावती ने स्वयं को अपने समर्थकों के सामने न सिर्फ ‘छल की शिकार’ के रूप में प्रस्तुत किया है बल्कि छिटके हुए वोटर्स के मन में भी ‘पीड़ित’ वाली छाप छोड़ने का प्रयास किया है। अब मायावती और बसपा का भविष्य क्या होगा यह भविष्य ही बताएगा; लेकिन हाल फिलहाल में तो EVM के हंगामे ने सुर्ख़ियों में बचा ही लिया है।

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