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अदालतों की सत्ता

Posted On 13 May, 2016 में

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अदालतों की सत्ता

बीते दिनों सरकार ने टेलीकॉम कंपनियों के लिए यह अनिवार्य किया था कि कॉल ड्राप की स्थिति में कंपनी द्वारा ग्राहक को हर्जाना देना होगा, मगर हाल ही में उच्च्तम न्यायालय द्वारा इस नियम को निरस्त कर दिया गया ! कारण जो भी रहे हों मगर एक बार फिर से न्यायपालिका ने सरकारी नियमों को पलटा है! न्यायालयों का हस्तक्षेप नया नहीं है, मगर अब हैरानी इस बात पर है कि नीतिगत मामलों में भी अदालतें हस्तक्षेप कर रही हैं, हाल ही में उत्तराखंड का प्रकरण भी इसी क्रम में है, जहां विधायिका के मामलों में पूर्णतः हस्तक्षेप न्यायालयों ने किया, जबकि एक विधानसभा को यह अधिकार है कि वे अपने अध्यक्ष के विरूद्ध प्रस्ताव लाकर भी स्वयं निर्णय कर सकती है, इस सन्दर्भ में एक उदाहरण उल्लेखनीय है जब 1956 में नेहरू सरकार के दौरान लोकसभा अध्यक्ष मावलंकर जी के विरूद्ध प्रस्ताव लाया गया था | मगर उत्तराखंड में न्यायालय की सक्रियता इस हद तक थी कि जैसे विधायिका कुछ है ही नहीं !
“न्यायालय हस्तक्षेप कर रहे हैं” ये बात न सिर्फ काफी समय से प्रचलित है बल्कि प्रसंग में भी है, सचमुच बीते कुछ दिनों से लग रहा है कि जैसे अदालतें एक स्वयंभू सरकार हो गईं हैं, न सिर्फ प्रशासकीय मामले बल्कि वित्तीय और कराधान तक के मामलों में अदालतों का दखल बढ़ रहा है, उत्तराखंड के मामले में नैनीताल न्यायालय ने संविधान के संरक्षक राष्ट्रपति तक पर टिप्पणी दे डाली! यहां तक कहा गया कि ” राष्ट्रपति भी भ्रष्ट हो सकता है ” ! जरूर हो सकता होगा मगर क्या न्यायाधीश भ्रष्ट नहीं हो सकता ? न्यायाधीश का भी एक चुनावी मत होता है, न्यायाधीश का भी कोई पसंदीदा राजनैतिक दल हो सकता है, उसके फैसलों में भी उसकी पसंद का प्रभाव जरूर रहता होगा, मगर क्या ये बातें कही जाना जरूरी हैं? अदालतों को यह समझना होगा कि यदि राष्ट्रपति सर्वोच्च नहीं है, तो अदालतें भी सर्वोच्च नहीं हैं | अदालतें संसदीय कानूनों का पालन करवाने हेतु हैं, न कि संसद पर हावी होने हेतु ! हर बार न्यायपालिका खुद को सरकार पर थोपती है और भूल जाती है कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका लोकतंत्र के विभिन्न अंग है, संसद या विधायिका जनता द्वारा चुनी हुई इकाइयां हैं जो कि सर्वोच्च हैं, इनके कामकाज पर न्यायालय नियंत्रण नहीं कर सकते,न्यायालय का फैसला दो चार वकीलों को सुनकर कुछ न्यायाधीशों के विवेक पर आधारित होता है जबकि संसदीय निर्णय लम्बी बहस, जनप्रतिनिधियों के आपसी तर्क वितर्क और विस्तृत अध्ययन पर आधारित होते हैं|
जनहित याचिका को हम न्यायिक सक्रियता का मुख्य माध्यम मानते हैं और जनहित को मुख्य प्रायोजन; मगर क्या खुद न्यायालय जनहित को बनाए रखने में सफल हो पाये हैं? न्यायालय जरूर सरकार को नसीहत दे सकते हैं, मगर न्यायालय इस बात पर जनता को क्या जवाब देंगे कि चारा घोटाले के जिस नेता को सजा देने में अदालत को वर्षों लग गए ; उसी नेता को आज़ाद करने में अदालतों ने महीने भी नहीं लगाए ? अदालतें कभी खुद में भी तो हस्तक्षेप करें ?
विधायिका सही है ऐसा कहना संभव नहीं, मगर न्यायपालिका द्वारा विधायिका को नियंत्रित करने का प्रयास अलोकतांत्रिक है, यह अदालतें कैसे तय कर सकती हैं कि संसद कैसे काम करेगी? इन दोनों अंगों को परस्पर सहयोग और संयम से चलना चाहिए, जिसमें अग्रणी विधायिका ही होगी ! क्यों कि वही जनता द्वारा चुनी गई है| दो तीन लोगों के विवेक से, पांच सौ जनप्रतिनिधियों के फैसले नहीं पलटे जाने चाहिए ! न्यायालयों की स्थिति पर मुख्य न्यायाधीश संघप्रधान के सामने रो तो सकते हैं, मगर कभी कॉमन सिविल कोड के लिए कोई नहीं बोलता, और ना ही हस्तक्षेप करने की हिम्मत दिखा पाता! ऐसे में न्यायिक सक्रियता एक पक्षीय मालूम होती है, जिसमें जनहित जैसा तो कुछ नहीं|

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rameshagarwal के द्वारा
May 14, 2016

जय श्री राम बिलकुल सहमत है उत्तराखंड के मामले में विधयाको को खरीदा गया स्टिंग सीडी पर कोइ कार्यवाही क्यों नहीं हाई कोर्ट के जज की टिप्पणी राजनातिक थी और गैर ज़रूरी कन्हैया और अन्य विधायार्थियो के मामले में जिन्होंने राष्ट्र के खिलाफ नारे लगाये उनकी सजा पर स्टे समाजक से परे लालू राजनेता हो रहा जिसे जेल में होना चाइये कुछ न्यायालयों को सोचना चाइये


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