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जातियां जरुरी हैं

Posted On 18 Mar, 2016 में

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जातियों को लेकर कुछ लोगों के मन में बड़ी नकारात्मक अवधारणाएं हैं, इसका कारण है एक झूठी महत्वाकांक्षा ! समानता की महत्वाकांक्षा जो कि इस संसार की सबसे झूठी इच्छा है! बात भले कड़वी लगे मगर समानता की बात करने वाले दरअसल एक दुकान चला रहे होते हैं, जो उनके क्षेत्र में उनकी रोजी रोटी होती है | वस्तुतः समानता एक कभी सच न होने वाली कल्पना मात्र है, जिस कल्पना के सहारे कई बुद्धिजीवियों की जीविका चलती है, वे जातियों का विरोध करते हैं, धर्म का विरोध करते हैं, और कभी कभी समानता का भूत इतना हावी हो जाता है कि बात राष्ट्र के विरोध तक आ जाती है | मगर वे इस मूल सत्य से आँखें मींच लेते हैं कि चाहे वैज्ञानिक दृष्टि से देखो या वैदिक दृष्टि से, संसार का हर जीव एक दूसरे से पूरी तरह भिन्न है! दो मनुष्यों के आँख , नाक , मुँह तो क्या हाथ से लिखी लिखावट तक समान नहीं मिलती ! फिर आप किस समानता की इच्छा रखते हैं?

आप कहते तो हैं कि हर मनुष्य को बराबर समझो, मगर आपके घर में कौन घुसेगा – कौन नहीं? आपकी संपत्ति कौन लेगा -कौन नहीं ? आदि विषयों में आप सभी को समान समझने की कोशिश बिल्कुल भी नहीं करते ! क्या समानता का कोई भी पक्षधर अपने पड़ोसी को अपने परिवार जितने अधिकार दे सकता है ? बिल्कुल नहीं ! ऐसे में वह समानता लाने का ब्रह्मवाक्य न जाने कहाँ चला जाता है ? आप अपने परिवार को अन्य लोगों से अधिक महत्व देते हैं, हर कोई देता है , ये परिवारवाद है; वही बात जातियों के सम्बन्ध में हैं, जातियां परिवार का एक बड़ा स्वरुप है और इसी क्रम में धर्म जाति का और राष्ट्र धर्म का बड़ा स्वरुप है ! संसार की सुंदरता इसकी विवधता में है, जातियां भी विविधता का ही एक हिस्सा हैं, आपके प्रयास विविधता में एकता के होने चाहिए, न कि विविधता को समाप्त करने के |
इसीलिए विरोध जातियों का नहीं, जाति आधारित भेदभाव का होना चाहिए, ऊंच नीच का होना चाहिए ! क्यों कि जातियां तो बनेंगी , धर्म भी बनेंगे ,स्वाभाविक है! एक समान आदतें व विचारधाराएं अपने आप जाति का रूप ले लेती हैं, मगर हमारा विरोध जातियों के वंशानुक्रम में बहने के विरुद्ध होना चाहिए ! ब्राह्मण का पुत्र ब्राह्मण ही रहे ये जरूरी नहीं, शूद्र का पुत्र शूद्र ही रहे ये भी जरूरी नहीं | इसलिए नए सवर्ण बनने दो, नए पिछड़े बनने दो | और इसी आधार पर आरक्षण में भी नए लोगों को स्वीकार करो | यदि आप व्यवहार में जातियां हटाना चाहते हैं तो अवसर और आरक्षण में भी जातियों को हटाने की इच्छाशक्ति दिखानी होगी | आप किसी भी व्यक्ति से ये उम्मीद नहीं कर सकते कि वह अपने साथ आर्थिक भेदभाव करवाता रहे और दूसरों को सामाजिक सम्मान देता रहे ! प्रजा से समानता की चाह रखने वाले शासकों ने विधान तक समान नहीं बनाये, और न ही उन्हें समान रूप से लागू ही किया ! यदि आपको इतिहास में शोषण दिखता है, तो ये कहाँ का न्याय है कि पूर्वजों के कार्यों का बदला वंशजों से लिया जाए ?आप सामाजिक शोषण का प्रतिशोध आर्थिक शोषण से लेना चाहते हैं, वो भी उनके बच्चों से? क्या ये समानता कहलाती है?

समानतावादियों में एक और प्रपंच पाया जाता है कि वे समानता की बात सिर्फ मनुष्यों के लिए करते हैं, पशुओं के बारे में उनके विचार स्पष्ट हैं कि किसे भोजन बनाना है, किसे पालतू बनाना है, किसे गाड़ियों में हांकना है, और किसे उसकी दुर्गति पर छोड़ देना है ! उनके लिए जीवभक्षी कुत्ते और बिल्लियाँ प्यारे और मासूम हैं मगर कभी किसी की हत्या न करने वाले गाय, मुर्गी, बकरी आदि मार देने योग्य? वास्तव में समानता की कामना एक बड़ा चालाक व्यापार है, वे पशुओं में तो जातियां चाहते हैं मगर मनुष्यों में समानता ! क्यों कि वे पशुओं को समानता के स्वप्न नहीं बेच सकते !

लोगों को पृकृति ने अलग बनाया है, विभिन्न क्षेत्रों की विभिन्न संस्कृतियों में उन्होंने अपने समूह बनाये हैं, और ये समूह बनते रहेंगे , इन्हें आप नहीं रोक सकते ! लोग समान नहीं हो सकते, किसी भी कीमत पर नहीं, दया गुण वाले मानव होंगे, रक्त भक्षक दानव होंगे इनको आप समान कैसे बना सकेंगे ? विरोध हो तो उत्पीड़न का हो, ऊंच-नीच का हो, छुआछूत का हो, ये क्या कि आप जातियों के अस्तित्व को ही समाप्त करना चाहते हैं? प्रयास करिये तो सामाजिक सौहार्द के करिये , जातियों में प्रेम बढ़ाने के करिये, मगर जातियों को खत्म करने की कल्पना तो आधारहीन है, आप एक तरह से जातियां खत्म करेंगे तो दूसरी तरह से फिर बन जाएंगी, क्षेत्र के आधार पर तो कभी विचारों के आधार पर ! सामान्य सी बात है कि व्यक्ति जब देश में होता है तो अपने शहर के लोगों को अधिक प्रेम करता है, जब देश के बाहर होता है तो अपने देश वासियों को ! ठीक ऐसे ही वह समाज में अपनी जाति के लोगों को अधिक प्रेम करता है, अब प्रेम कोई ऐसी चीज़ तो है नहीं जो आप जबरन किसी और के लिए भी करा सकें, सभी को अपना वर्ग -अपना समूह चुनने का अधिकार है,और यह भी अधिकार है कि वह किसे प्रेम करे किसे नहीं ! इसलिए जातियों को नकारात्मक दृष्टि से देखना बंद कीजिये क्यों कि ये परिवार का ही एक बड़ा रूप हैं और अपने परिवार से लगाव रखना कुछ गलत नहीं !

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pkdubey के द्वारा
March 18, 2016

बहुत अच्छा और समयानुकूल लेख | विडम्बना की बात यह भी है ,जातियों को आरक्षण भी चाहिए और वह उच्च जाती के भी होना चाहते हैं ,आज समाज में बहुत ऐसे व्यक्ति हैं जो ब्राह्मण नहीं है पर आचार्य बनकर जीवन यापन कर रहे ,उच्च जातियों के कुल पुरोहित हैं ,कुछ ने तो अपनी जाती ही बदल ली | यह जाती का बहुत जटिल विषय है ,यह कब तक सुलझेगा ,भगवान जाने |


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