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तो ऐसे सुधर जाएगी शिक्षा प्रणाली?

Posted On: 20 Aug, 2015 Others में

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कल एक फरमान सुना जिसमें सभी राजकीय कोष से वेतन पाने वाले व्यक्तियों के बच्चों को राजकीय विद्यालयों में पढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं |
पहले भी फेसबुक पे ऐसे शिक्षा सुधार के सुझाव बहुत देखे हैं मैंने | हालंकि मेरे परिवार में कोई भी राज्य कर्मचारी /अधिकारी नहीं है फिर भी मैं इस फरमान से न सिर्फ असहमत हूँ बल्कि इसे प्रभाव शून्य और नकारात्मक समझता हूँ |
क्या ये ऐसा नहीं है कि एक की गलतियों और अकर्मण्यता का फल उसके पडोसी की संतानों को दिया जाने वाला है, आरक्षण व्यवस्था में भी तो हम यही झेल रहे हैं कि हमारे पूर्वजों ने कभी दलितों को दबाया होगा जिसके मुआवजे में हम अपनी योग्यता को रद्दी में संभाले हुए हैं, उससे क्या हुआ ? क्या हो पाया दलित उत्थान? फिर क्या अब ये ही क्रम बनाया जाना है कि गलती एक की हो और परिणाम सभी की संतान भुगते?
आप शिक्षा व्यवस्था नहीं चला पा रहे ये आपका दोष है, आपके शिक्षा विभाग का दोष है, इसका खामियाजा पुलिस वालों, नगर निगम वालों, परिवहन निगम वालों, ग्राम्यविकास वालों, लोक निर्माण विभाग वालों आदि के बच्चे क्यों भुगतें?
हर फैसले भावावेश में आकर नहीं दिए जाते, आप कभी ये भी तो गौर करिये कि ये हालत है , तो क्यों कर है? प्राइमरी के बच्चे टाट / जमीन पे बैठ के पढ़ते हैं, तो क्या इसका परिणाम परिवहन निगम वालों के बच्चे भी भरेंगे? विद्यालओं की छतें टपकती हैं ये गलती पुलिस वालों के बच्चों की है ? अध्यापक ज्ञान शून्य हैं इसके जिम्मेदार नगर निगम वालों के बच्चे हैं ? ये सभी आपसे वेतन लेकर आपको सेवाएं देते हैं, इसके बाद उनका परिवार क्या करेगा क्या नहीं इस पर आपका कोई अधिकार नहीं रह जाता | आप यदि सेवाएं नहीं ले पाते ये आपका दोष है ये कहाँ का न्याय हुआ ? आप इसे सुधारवादी कहते हैं? चलिए इसके बाद भी सुधार नहीं हुआ तो? क्या एक पीढ़ी हम आपके प्रयोगों में तबाह कर दें? आपका बस, केवल परिषदीय स्कूल्ज तक ही तो रहेगा, घर की प्राइवेट ट्यूशन को आप रोक लेंगे क्या?
कभी ये भी जानिये कि राजकीय इंटरमीडिएट , आईटीआई , इंजीनियरिंग कॉलेज आदि की शिक्षा व्यवस्था प्राइमरी से बेहतर क्यों है? क्यों वहां सीट्स के लिए मारा मारी होती है, और क्यों यहाँ खाना पीना कपड़े सब देने के बाद भी आधी सीट्स ख़ाली रह जाती हैं | क्या फिर आप ये भी सुनिश्चित करेंगे कि राज्य कर्मचारियों के बच्चों को सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज में भी एडमिशन पक्का मिलेगा? सिर्फ प्राइमरी में ही क्यों? आप ये चाहते हैं कि बच्चे प्राइमरी में जबरदस्ती धकेले जाएँ और इंजीनियरिंग कॉलेज में अपनी योग्यता से जाएँ? वाह बड़ा सही न्याय है ?
प्राइवेट और कान्वेंट स्कूल्ज की उन्नति से सभी की छाती पे सांप लोटते हैं , पर कभी जानिये भी तो कि क्यों इन स्कूल्ज के बच्चे आपके प्राइमरी के बच्चों से तेज होते हैं?
क्यों कि यहां पढ़ाने वाले अध्यापक आपकी आरक्षण व्यवस्था से भर्ती नहीं होते, योग्यता से भर्ती होते हैं| यहां के अध्यापक अंगूठा छाप नहीं होते | ये सच है आपकी चयन प्रणाली का कि अधिकांशतः जिस तरह के अध्यापक आपके शिक्षा विभाग में ५००००/- की तनख्वाह काटते हैं वे किसी कान्वेंट या विद्याभारती के विद्यालय में १००००/- की नौकरी पर भी नहीं रखे जाएंगे | इसीलिए मेरा सुझाव ये है कि बजाय इन फरमानों के , वह व्यवस्था या नियम बनाइये कि प्राइमरी में सिर्फ वे ही शिक्षक बन पाएं जिन्हें किसी कान्वेंट, विद्याभारती, या अच्छे प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने का कम से कम २ साल का अनुभव हो | ये बच्चे आपकी जड़ें हैं कम से कम इन पर तो प्रयोग न कीजिये|
बच्चों को अपनी असफल और खोलखी नीतियों का भुक्तभोगी न बनाइये, पहले अपनी शिक्षण व्यवस्था सुधारिये, भर्ती प्रक्रिया सुधारिये, कौन कहाँ पढ़ेगा ये निर्धारण करना आपके अधिकार क्षेत्र से बाहर है |

-पुष्यमित्र उपाध्याय

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