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देख तमाशा दिल्ली का

Posted On: 14 Jan, 2014 Others में

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पिछले कुछ दिनों से कई राजनीतिक उठा पटक चल रहीं हैं, कांग्रेस के लिए यह संतोष का विषय हो सकता है कि सोशल मीडिया पर उसे मुख्य रूप से आलोचना का शिकार नहीं बनाया जा रहा , बल्कि ये स्थान अब केजरीवाल ने ले लिया है| ये एक रणनीति के तहत हो सकता है मगर वो अलग विषय है| हाल ही में जो चर्चा का सबसे बड़ा विषय बन कर उभरा है वह है ‘अमेठी ‘| राहुल गांधी को हराने के लिए कुमार विश्वास का अमेठी जाना मीडिया खासकर ‘इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिए खासा कौतूहल बना हुआ है| मगर मुद्दा यह है कि राहुल को या मोदी को चुनाव में हरा देना क्या देश की समस्याओं का हल होगा? राहुल गांधी तो अन्य स्थान से भी चुनाव लड़ लेंगे| इन्हें हरा देने की बात करना एक लोकप्रियता का विषय हो सकता है मगर देश की मूल समस्याओं पर से जनता का ध्यान हटाने का एक शर्मनाक कृत्य भी है| कुमार विश्वास जिस पार्टी से ताल्लुक रखते हैं उस पार्टी के मुखिया वे माननीय हैं जो सात आठ हज़ार की भीड़ को अपनी निजी शेखी के चक्कर में झेल पाने में असमर्थ सिद्ध होते हैं| उनके शीर्ष नेता बचकाने ब्यान देने के लिए प्रसिद्द होते जा रहे हैं, कभी दिल्ली के क़ानून मंत्री उच्च न्यायालय के जजों की मीटिंग लेने की बात कह कर शासन के प्रति अपनी समझ का परिचय देते हैं तो कभी प्रशांत भूषण राष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी गम्भीरता की कलई खोलते हैं| फैसला पहले लिया जाता है उसपे मंथन उसके बाद किया जाता है…और अंततः उसे वापस ले लिया जाता है (जनता दरबार के सन्दर्भ में)| शायद इस अपरिपक्वता के लिए ही दिल्ली की प्रयोगशाला खुली हुई है|
“सिर्फ हंगामा करना ही मेरा मकसद नहीं, मेरा मकसद है कि तस्वीर बदलनी चाहिए” इसी प्रकार के उदघोषों से अक्सर ‘आप’ अपनी छवि चमकाते थे, किन्तु हाल के हाल को देखा जाए तो स्पष्ट दिखता है कि यह पार्टी सिर्फ हंगामों की ही उपज है और ‘हंगामा’ उद्देश्य की पूर्ति के लिए काम करती है| ‘आप’ द्वारा किये जा रहे लोकसभा के चुनावी प्रयासों से यह साफ़ होता है कि ये पूर्ण बहुमत पाने के लिए चुनाव नही लड़ रहे| इनका उद्देश्य कहीं न कहीं सिर्फ ऐसा माहौल तैयार कर देना है जिससे इनकी छवि राष्ट्रीय बन जाए और जो वह स्थिति उत्पन्न की जाए, जिससे देश को एक स्थायी सरकार मिल पाना असम्भव हो जाए| क्या ये इनकी गम्भीरता को दर्शाता है, क्या ऐसी लंगड़ी सत्ता के बाद देश महंगाई और असुरक्षा से नहीं जूझेगा? क्या ये इस बात से अनभिज्ञ हैं?
वे ईमानदार हैं उन्हें मौक़ा मिलना चाहिए; बात ठीक है! दिल्ली मिल गयी, मौक़ा मिल गया! मगर वे ईमानदार हैं उन्हें देश मिलना चाहिए… ये क्या तर्क हुआ? क्या ईमानदारी एक मात्र तर्क और विशेषता है विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को चलाने के लिए? मनमोहन भी स्वघोषित ईमानदार है मगर क्या वे पिछले पांच वर्षों में कुछ दे पाये देश को? देश उस दशा में नहीं है जो इसकी सत्ता में प्रयोग करने की स्वीकृति दी जाए| देश को ऐसा नेतृत्व चाहिए जिसमें ईमानदारी और प्रशासनिक कुशलता के साथ अपने फैसलों पर बने रहने का अटल सामर्थ्य भी हो|
आम आदमी पार्टी खुद भी जानती है कि वे पूर्ण बहुमत में नहीं आयेंगे, फिर भी वे देश को एक भ्रष्टाचार मुक्त शासन देने का ढोल बजाते फिर रहे हैं| जबकि सच यही है कि वे सिर्फ उलझनें बढ़ाना चाहते हैं| दिल्ली में भी वे पूर्ण बहुमत में नहीं थे , सरकार भी नहीं बन सकती थी कांग्रेस के शामिल हुए बिना! फिर से देश को अस्थिर शासन देने की पैरवी करके वे देश के प्रति किस ईमानदारी का परिचय दे रहे हैं? या फिर कांग्रेस को पुनः सत्ता में लौटाने के अप्रत्यक्ष प्रयास किये जा रहे हैं| क्यों कि भाजपा को तो वे समर्थन देने वाले नहीं! ‘आप’ आम आदमी के लिए कुछ करें ना करें मगर कांग्रेस के लिए जो कुछ कर रहे हैं वह अविस्मरणीय है|
सच ही है हाथ के बिना झाड़ू तो चलती नहीं!
दूसरा मुद्दा पत्रकारों/ लेखकों का राजनीति से जुड़ने का है| मैं इसे कतई गलत नहीं मानता, पत्रकार वैसे भी ७५% राजनीति ही करते हैं , १००% हो जाएँ तो बुराई नहीं| किन्तु दुःख तब होता है जब महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए रचनात्मकता विकल्प तलाशती है| आम आदमी से इसका कोई वास्ता नहीं है| अन्य पत्रकारों के सन्दर्भ में भी कहा जाए तो.. वे भी एक नागरिक होते हैं, वोट वे भी देते हैं; मगर उनका सबसे बड़ा आभूषण निष्पक्षता होती है| बेशक होनी भी चाहिए| मगर मैं इस बात का भी पक्षधर हूँ कि जब बात देश को एक स्थायी और सशक्त नेतृत्व देने की हो, और लग रहा हो कि ये कार्य निष्पक्ष रहते हुए नहीं हो सकता तो उन्हें भी अपने वेतन और निष्पक्षता से इतर देशहित में आना चाहिए | क्यों कि हो सकता है आने वाले वर्षों में पत्रकारिता की उज्ज्वलता इसी में निहित हो| पत्रकार तो बुद्धिजीवी होते हैं, उन्हें परिस्थितियों व उनके परिणामों का पूर्ण ज्ञान होता है, किन्तु आश्चर्य है कि वे अब भी इस पर चुप्पी साधे हुए हैं, कि वर्त्तमान हालात किस दिशा में ले जायेंगे? क्या वे इस बात के पक्षधर हैं कि एक कमज़ोर और संगठन विहीन पार्टी देश को उन हालातों में धकेल दे जिसमें से उभर पाना नामुमकिन हो जाए? क्या वे विदेशी क़र्ज़ और हमारी कमज़ोर अर्थव्यवस्था से अनभिज्ञ हैं? क्या वे इस बात से भी अनभिज्ञ हैं कि जिस पार्टी के मास्टर माइंड का कश्मीर के प्रति ऐसा अपरिपक्व विचार हो, वे राष्ट्र के लिए कितने उपयोगी हो सकते हैं? मगर लगता है कि शायद अब कांग्रेस को सत्ता में लौटाने का यही एक मात्र विकल्प बच गया है| क्यों कि प्रत्यक्ष रूप से तो कांग्रेस अब मोदी के वोट खींच पाने में असमर्थ है, फिर क्यों न केजरी के कंधे से ही संधान किया जाए| मीडिया का रुख तो यही दर्शा रहा है| शेष तो ईश्वर जाने|

जय भारत!!

-पुष्यमित्र उपाध्याय

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
January 17, 2014

अभी देखते जाइये , पल पल रंग बदलते ईमानदारों को !

Santlal Karun के द्वारा
January 16, 2014

आप की गतिविधि और भावी राजनीति पर सुविचारित आलेख; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !


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