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सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयंगे

Posted On: 28 Dec, 2012 Others में

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छोडो मेहँदी खडक संभालो
खुद ही अपना चीर बचा लो
द्यूत बिछाये बैठे शकुनि,
मस्तक सब बिक जायेंगे
सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयेंगे

कब तक आस लगाओगी तुम,
बिक़े हुए अखबारों से,
कैसी रक्षा मांग रही हो
दुशासन दरबारों से|

स्वयं जो लज्जा हीन पड़े हैं
वे क्या लाज बचायेंगे
सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो अब गोविंद ना आयंगे

कल तक केवल अँधा राजा,
अब गूंगा बहरा भी है
होठ सी दिए हैं जनता के,
कानों पर पहरा भी है

तुम ही कहो ये अश्रु तुम्हारे,
किसको क्या समझायेंगे?
सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयंगे

-पुष्यमित्र उपाध्याय

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
December 28, 2012

बहुत ही सुन्दर आह्वान! अब इसके सिवा कोई दूसरा चारा भी नहीं है! कल तक केवल अँधा राजा, अब गूंगा बहरा भी है होठ सी दिए हैं जनता के, कानों पर पहरा भी है तुम ही कहो ये अश्रु तुम्हारे, किसको क्या समझायेंगे? सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयंगे

vinitashukla के द्वारा
December 28, 2012

पुष्पपमित्र जी, पहली बार आपके ब्लॉग पर आ रही हूँ. आपकी रचना पढ़कर सुखद आश्चर्य हुआ. बहुत ही सरल, सहज भाषा में इतनी सशक्त अभिव्यक्ति! बधाई एवं साधुवाद.

sanjay singh के द्वारा
December 28, 2012

आदरनीय पुष्यमित्र जी अतिउत्तम अतिउत्तम आपने सच लिखा है . आपकी यह कविता अतुल्निय है ,मै आपकी कविता के लिए कोटि कोटि साधुवाद प्रेषित करता हूँ. कृपया स्वीकार करे और इसी प्रकार लिखते रहे. धन्यवाद आपका संजय सिंह ‘भारतीय”


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