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खत्म हो गयी दुनिया!

Posted On: 22 Dec, 2012 Others में

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कमरे के चार परदोँ के बीच,
पडा हूँ मैँ भी!
जीता हूँ या बेजाँ पता भी नहीँ..
कई रोज से जान का एहसास हुआ भी नहीँ..
शायद अब साँस नहीँ बाकी’
तुम्हारी ही तरह!
कल तुमने सही कहा था…
एक रोज दुनिया खत्म होगी!
और हो भी गयी,
कोई रोये
कोई चीखे
तडपे
लुटे
पिटे
मिटे
मिट जाये
चाहे तबाह हो जाये
कौन सुनता है
कौन देखता है
कौन आता है
बाकी हैँ सिर्फ पिशाच ही अब
बेखौफ सडकोँ पे घूमते
लाशोँ को छीलते
दिन ब दिन पनपते
सारी लाशेँ बेवास्ता
सारी लाशेँ बेबस
सारी लाशेँ तमाशाई
कहाँ रही दुनिया
खत्म हो तो गई
कहाँ है आवाज़ अब
सब हैँ लाशोँ के ढेर मेँ एक लाश
कल तुमने सच कहा था…
एक रोज खत्म होगी दुनिया!

-पुष्यमित्र

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

mrssarojsingh के द्वारा
December 26, 2012

बहुत अच्छी अभिव्यक्ति है पुष्यमित्र जी स्वागत एवेम बधाई

Santlal Karun के द्वारा
December 22, 2012

आदरणीय पुष्यमित्र जी, मंच पर आप का स्वागत है | आप की कविता के रूप में पहली प्रस्तुति अत्यंत सामयिक, मार्मिक और प्रभावशाली है; वर्तमान में नारी-अस्मिता की पीड़ा व्यक्त करती संवेदना की सशक्त कविता; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! “बाकी हैँ सिर्फ पिशाच ही अब बेखौफ सडकोँ पे घूमते लाशोँ को छीलते दिन ब दिन पनपते सारी लाशेँ बेवास्ता सारी लाशेँ बेबस सारी लाशेँ तमाशाई कहाँ रही दुनिया खत्म हो तो गई कहाँ है आवाज़ अब सब हैँ लाशोँ के ढेर मेँ एक लाश”

Santlal Karun के द्वारा
December 22, 2012

आदरनीय पुष्यमित्र जी, मंच पर आप का स्वागत है | आप की कविता के रूप में पहली प्रस्तुति अत्यंत सामयिक, मार्मिक और प्रभावशाली है; वर्तमान में नारी-अस्मिता की पीड़ा व्यक्त करती संवेदना की सशक्त कविता; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! “बाकी हैँ सिर्फ पिशाच ही अब बेखौफ सडकोँ पे घूमते लाशोँ को छीलते दिन ब दिन पनपते सारी लाशेँ बेवास्ता सारी लाशेँ बेबस सारी लाशेँ तमाशाई कहाँ रही दुनिया खत्म हो तो गई कहाँ है आवाज़ अब सब हैँ लाशोँ के ढेर मेँ एक लाश”


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